Skip to main content
उस दिन मुझे जाने क्या ऐसा हो गया था
काम से लौटकर बिस्तर पर गिर कर सो गया था
कोई आवाज़ दे मुझको पर दिखाई न दे
मैं अपने ही घर में जाने कहाँ खो गया था
वो कोई ख़्वाब था हकीकत मालूम नहीं मुझे
तूने गोद में रखकर सर मेरे होंठों को छुआ था
बड़ी देर तक आईने में देखा किया खुद को
पता नहीं वो मैं ही था या कोई और वहां था .

Comments

Popular posts from this blog

............

किसी नदी के किनारे बारिश में उदास पुल के नीचे बैठकर कभी पढ़ी है कोई ज़िन्दगी की कविता .....…............................................ तेज बारिश की धुन शोर मचाती नदी जैसी ही होती है और ख्यालों को भीगने से बचा लेना जरूरी इसलिए तुम्हारे छाते का खो जाना कोई इत्तेफ़ाक नहीं है। ....................................................... इससे पहले नशा उतर जाये बारिश खत्म हो और शहर चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाए मुझे अपनी ख्वाहिशों की नाव पर बैठकर कहीं और चले जाना चाहिए।

कुछ बेवज़ह

तेरे ख्वाबों से जिंदा है मेरी कहानियां अब तक , तुझे शब्दों में पिरोउं तो ऐसा लगता है  . खिड़की से झांकती एक शाम अधूरी , दरवाज़े पे खड़ा है कोई ऐसा लगता है. तेरे गाँव का रास्ता मुझे मालूम है फिर भी  तेरे घर तक नहीं पहुचुँगा ऐसा लगता है . मेरे ख्यालों के दीवारों पर जब धुप उतरती है , मैं लिखता हूँ कुछ बेवज़ह ऐसा लगता है.   

छाता

एक दिन तुमने मुझे अपना छाता दिया था मैं तुम्हारे घर के दरवाजे पे खड़ा था और बाहर बारिश हो रही थी बहुत कुछ कहना चाहता था तुमसे पर तुम्हारा घर इतना बड़ा है कि - मेरे अल्फ़ाज़ तुम्हारे कानों तक पहुँचने से पहले ही कहीं खो गये ज़रा देख लेना कहीं कोई थककर तुम्हारे तकिये के पास पड़ा सुस्ता न रहा हो या तुम्हारे बालों में आके उलझ गया हो जैसे मैं उलझ जाता हूँ  मैं जब भी मिलता हूँ तुमसे ये घड़ी के कांटे मुझे काँटों की तरह चुभते हैं साले आराम से चलने बजाय दौड़ने लगते हैं तुम्हारा छाता अभी भी मेरे पास है जब भी लौटाने की सोचता हूँ ... बारिश आ जाती है।