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शब्द

शब्द हाँ, शब्द. ... कई बार  निरर्थक हो जाते हैं ये बताते हुए कि आपको उन चीजों से लगाव क्यों हैं जो बाकियों के लिए हैं -बेकार ,बकवास शब्द हाँ, शब्द. ... कई बार चमत्कारिक होते हैं (हो उठते हैं ) जब वे गढ़े जा रहे होते हैं दिल के किसी कोने में किसी के लिए तब मुरझाया हुआ पेड़ हरे पत्तों से सरोबार हो उठता है सूखे हुए तालाब में तैरती हैं मछलियाँ गर्मियों में खिड़की से घुस आती है ठंडी धूप शब्द हाँ, शब्द. ... कई बार उदास होते हैं ( या करते हैं उदास होने का नाटक ) जब कोई सुबह से पहले के अँधेरे में उन्हें जगा देता है एक कविता लिखने के लिए .

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घुटन  अविश्वसनीय  पीड़ा  अविश्वसनीय  रोज चले आते हैं मेरे बिस्तर पर  तकिये के नीचे  बुदबुदाते हैं  घुस जाते हैं मेरे सपनों में  नोच नोच कर खाते हैं उन खूबसूरत कहनियों को  जिनमे मैं जिंदा रहना चाहता हूँ ........ताउम्र  जैसे एक नदी अपनी ही धुन में बहना चाहती है हमेशा .

एक दिन

एक दिन-  उदासियों में डूबे  हुए जब शाम की खिड़की खोली देखा संमुन्दर घर की दहलीज़ पर आ गया है चारों ओर फैली है रेत-नर्म और गीली बिल्कुल मेरे ख्यालों की तरह पांवों के निशान पीछे छोड़ते हुए मैं ढूँढ रहा हूँ किसी को , जिसे होना चाहिए था यही पर मेरे साथ लेकिन मुझे मिली-  छोटी-छोटी सीपियाँ एक टूटी हुई वायलिन बंद पड़ी हुई रेत घडी और एक सीलबंद लिफाफा न जाने कौन रख गया है , किसके लिए ,पता नहीं जब समुंदर ने सूरज को निगल लिया और रह गयी गीले शोरों की धुन रेत पर रेंगती उँगलियाँ थम सी गयी लहरों पर चलती हुई एक परी मेरे पास आई और बोली - "ये लिफाफा मेरे लिए हैं ". उसके हाथ बर्फ जैसे ठंडे थे चेहरा उजालों से भरा हुआ लिफाफा हाथ में लिए वो कुछ पल के लिए मुस्कुराई फिर लौट गयी उन्हीं लहरों के बीच मैंने रेत घडी उलट कर रख दी जोड़ लिया वायलिन के तारों को और छोटे-छोटे सीपियों से बोला - मुझे मालूम हैं ...मैं एक ख्वाब देख रहा हूँ .  

कुछ हलके फुल्के ......लम्हों की बात ...

kolavaree d ... .. जो सोचकर मैं उड़ रहा था आसमान में , हकीक़त उससे भी ज्यादा जमीनी निकली मैं तेरी खातिर छोड़ देता इस ज़िन्दगी को भी , लेकिन ज़िन्दगी तुझसे ज्यादा कमीनी निकली.... ................................................................................................................................................ .  confusion ........ मेरी हर कहानी में तेरा जिकर क्यूँ हैं कुछ होना नहीं है फिर भी इंतनी फिकर क्यूँ हैं... कुछ बाते हैं जो अक्सर समझ में नहीं आती ... life तेरी programing में इतना error क्यूँ हैं.... ..................................................................................................................................................  frustation ... .. कैसे तुमको दिखलाऊं इस दिल पे कितनी चोट है ग़ालिब की हजारों ख्वाहिशें  मेरी तो फिर भी एक है शायद तुम्हारे हिस्से में होंगे पिज्जा बर्गर मेरे हिस्से में तो बस फ्यूचर की खाली प्लेट है . काश! ज़िन्दगी तू भी मेरे संग डेटिंग पर चलती पर न जाने क्यूँ  ट्रेन तुम्हरी इतन...

मौसम बिलकुल भी रोमांटिक नहीं है....

मौसम बिलकुल भी रोमांटिक नहीं है.... जलती दोपहरी है  पसीने से तर बतर मैं  रुमाल रूम पर भूल गया हूँ  और तुम मुझे याद आ रही हो .. तुम्हरी हथेलियों का ठंडापन  गर्म साँसे  सन्नाटा  भीगी हुई हंसी  बिना शब्दों वाली भाषा सच कहता हूँ- मौसम बिलकुल भी रोमांटिक नहीं है ...... सड़को पर दौड़ती उदास बसे  ट्रेफिक का शोर  अपने निजीपन को बचाए रखने की होड़  कही कुछ छुट जाने का डर हाथों में दबी कैरिएर की फाइल  इन सबके बीच - तुम मुझे याद आ रही हो  लेकिन सच कहता हूँ - मौसम बिलकुल भी रोमांटिक नहीं है .

बारिश की रिंगटोन ....

आधी रात की  धीमी बारिश है.... हल्की ठण्ड है मैं अब भी जाग रहा हूँ .. एक खिलखिलाहट भरी आवाज़  मेरे कानों में गूँज रही है खिड़की से बाहर झांकता हूँ  एक पेड़ ठण्ड से कांप रहा है.. वो आवाज़ छनकर फिर मेरे कानो में गूँज रही है-- खिलखिलाहट भरी  नीद की ट्रेन आँखों के प्लेटफ़ॉर्म पे आ क्यूँ नहीं रही' ये हवायें खिडकियों पर इतना शोर क्यूँ मचा रही हैं  कमरे की बेतरतीब पड़ी हुई चीजों में - मेरे ख्वाब कहीं खो गए हैं. और ख्वाहिश facebook की फ्रेंडशिप लिस्ट की तरह ....... जिनसे चाहकर  भी chat नहीं हो  पाती . आँखे बंदकर लेटा हुआ हूँ फिर वही खिलखिलाहट भरी धुन मेरे कानो में गूँज रही है, अचानक मुझे  अपने  दोस्त की   चीख सुनाई देती है---- कम्बखत ! अपना फ़ोन क्यों नहीं उठाता .

कुछ बेवज़ह

तेरे ख्वाबों से जिंदा है मेरी कहानियां अब तक , तुझे शब्दों में पिरोउं तो ऐसा लगता है  . खिड़की से झांकती एक शाम अधूरी , दरवाज़े पे खड़ा है कोई ऐसा लगता है. तेरे गाँव का रास्ता मुझे मालूम है फिर भी  तेरे घर तक नहीं पहुचुँगा ऐसा लगता है . मेरे ख्यालों के दीवारों पर जब धुप उतरती है , मैं लिखता हूँ कुछ बेवज़ह ऐसा लगता है.