Thursday, September 9, 2010

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फलक,
रात,
तारे,
रौशनी,
चाँद,
और बारिस.
तुम कहती हो पागलपन है ,
मैं कहता हूँ दीवानापन .
एक स्पर्श ,
जो बारिस से नहला देती है ,
खवाहिश जो तारों की तरह मद्धिम है ,
और चाँद इतने करीब होकर भी दूर.
एक सिमटा हुआ फलक ,
जहां  आशा और निराशा मिलते हैं किसी बिंदु पर.
ये पागलपन नहीं है ,
ये एक नई दुनिया की खोज है -
यहाँ  जिंदगी एक नशा है.