Friday, February 25, 2011

कुछ बेवज़ह

तेरे ख्वाबों से जिंदा है मेरी कहानियां अब तक ,
तुझे शब्दों में पिरोउं तो ऐसा लगता है  .
खिड़की से झांकती एक शाम अधूरी ,
दरवाज़े पे खड़ा है कोई ऐसा लगता है.
तेरे गाँव का रास्ता मुझे मालूम है फिर भी 
तेरे घर तक नहीं पहुचुँगा ऐसा लगता है .
मेरे ख्यालों के दीवारों पर जब धुप उतरती है ,
मैं लिखता हूँ कुछ बेवज़ह ऐसा लगता है.   

Wednesday, February 16, 2011

बारिश की बूंदे फूलों की खुश्बू
इनसे भी महंगी तुम्हरी  हंसी है 
नमी रेत की और समुन्दर की  लहरें 
इनसे भी बढकर तुम्हरी ख़ुशी है 
ढलता हुआ सूरज किरण चांदनी की 
शायद तुम्हारे लिए ही बनी है 
लिखने को करता है दिल तो बहुत कुछ 
मगर मेरे पास शब्दों की कमी है...............