Saturday, April 1, 2017

डर के बीहड़ जंगलों में ,
रास्ते की खोज में तुम्हारे सपने ,
थककर समय की चट्टानों पे वैसे ही बैठ जाते हैं
जैसे बहती हुई नदी को
किसी ने अपने वश में कर लिया हो ,
जेबों में पड़ी अधूरी ख़्वाहिशें चिल्लरों की तरह शोर करती हैं
और तुम्हे लगता है --------
फूलों पे मंडराते भौरों ने जरूर कोई नशा कर रखा है
सुबह सुबह मरे हुए आदमी की तरह उठना
और घड़ी की सुइयों से चिपक जाना....
टिक टिक टिक ..............................
किसी को ढूंढना और खुद ही खो जाना
एक दिन सब कुछ खत्म हो जाने के इंतज़ार में
नदी के ऊपर खड़े उदास पुल
बारिश की बाट जोहते किसान
आसमानों में बिखरे रंग
इश्क़ का द्वन्द
और युद्ध का उन्मांद.



उस दिन मुझे जाने क्या ऐसा हो गया था
काम से लौटकर बिस्तर पर गिर कर सो गया था
कोई आवाज़ दे मुझको पर दिखाई न दे
मैं अपने ही घर में जाने कहाँ खो गया था
वो कोई ख़्वाब था हकीकत मालूम नहीं मुझे
तूने गोद में रखकर सर मेरे होंठों को छुआ था
बड़ी देर तक आईने में देखा किया खुद को
पता नहीं वो मैं ही था या कोई और वहां था .

Sunday, March 26, 2017

शब्दों की हेरा फेरी अजीब होती है 
टुकड़ा टुकड़ा जोड़ो और कुछ गढ़ लो 
बेमतलब सा आत्मसंतुष्टी के लिए 
और जब आस पास सब बदल रहा हो 
जरूरी होता है आपने आपको बचा लेना 
उन चीज़ों से जो तुम्हे अंदर से खा जाना चाहते हैं
चाँद में चरखा कातती बुढ़िया को देखना
पानी में पत्थर फेंकते उसकी छलांग तय करना
किसी लड़की का लड़के को बाहों में भर लेना
वेश्यालयों में लगी घंटी से अजान का निकलना
रास्ता काटती बिल्ली का तुम्हे घूरना
बचकाना सा लगता है .....
पर --
बेहतर होता है किसी से नफरत करने से ।