Friday, February 25, 2011

कुछ बेवज़ह

तेरे ख्वाबों से जिंदा है मेरी कहानियां अब तक ,
तुझे शब्दों में पिरोउं तो ऐसा लगता है  .
खिड़की से झांकती एक शाम अधूरी ,
दरवाज़े पे खड़ा है कोई ऐसा लगता है.
तेरे गाँव का रास्ता मुझे मालूम है फिर भी 
तेरे घर तक नहीं पहुचुँगा ऐसा लगता है .
मेरे ख्यालों के दीवारों पर जब धुप उतरती है ,
मैं लिखता हूँ कुछ बेवज़ह ऐसा लगता है.   

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